मैं, मेरा गांव और मेरी संस्कृति !

Last Updated : May 05, 2020   Views : 267

मैं, मेरा गांव और मेरी संस्कृति
स्टोरी : मनीषा पुंडीर
आओ आज खूबसूरत वादियों में ले चलती हूं अपने गांव की तरफ अपनी संस्कृति की तरफ जो मेरी पहचान है जहां नंबर से नहीं पापा के नाम से मशहूर है अपना गांव मेरा गांव बिन्हार में आता है गांव का नाम मदरसु है । वैसे तो मैं अपने मामाकोट को ज्यादा गई हूं पर फिर भी आज कुछ अपने गांव के बारे में बता रही हूं मेरा गांव भी खूबसूरत जगह है जो पहाड़ों और हरे-भरे घाटियों से गिरा है और अब पास में एक सुंदर सा रेस्टोरेंट भी खुल गया है जिसको देखने के लिए लोग बहुत दूर-दूर से आते हैं वह है इतने सुंदर स्थान पर पहाड़ों के बीच में जाहा जा के सबको खुशी और शांति प्राप्त होती है । मुझे अपने रीति रिवाज बहुत पसंद है जैसे सब के यहां अलग-अलग रीति रिवाज होते हैं वैसे ही मुझे अपना पहाड़ी कल्चर बहुत पसंद है सबसे ज्यादा भाषा अपनी वेशभूषा घाघरा जागा और danto में गांव से दूर रहती हूं लेकिन अपने रीति रिवाज अपना कल्चर बहुत लुभाता है ।जब भी अपनी भीड़ भाड़ भरी जिंदगी से वक्त मिलता है जब गांव की तरफ जाते हैं तो बहुत सुकून मिलता है जैसे के जन्नत में पहुंच गए हो इतना सुंदर साफ और शुद्ध वातावरण जो हर किसी को अपनी तरफ आकर्षित करता है और जब हमारे गांव में शादी होती है तब सब लोग दौड़े चले आते हैं दादी से लेकर नई बहू सब घागरा dhanto पहनती है । जो हमारा डांस है जो ढोल दमाऊ और जब ये होता है जैसे मानो सारी परेशानी भूलकर बस डांस करने लगते है और सब लोग उसका आनंद लेते हैं इतने मस्त हो जाते हैं सबके चेहरे की खुशी देखने लायक होती है । सब जितना इंजॉय करते हैं सब बहुत अच्छा लगता है लेकिन इस कंपटीशन के चक्कर में एक अच्छी नौकरी को पाने के लिए सब गांव छोड़ शहर की ओर भागी चले जाते है ।

 

हमारी पीढ़ी भी अपने रीती रिवाज नहीं जानती तो आने वाली पीढ़ी को तो मालूम ही नहीं होगा । हम भी जा रहे हैं गांव से दूर अच्छी शिक्षा के लिए अच्छी नौकरी के लिए तैयारी करने के लिए और अब नौकरी लग जाता अपने मां-बाप से दूर चले जाते हैं जो गांव छोड़ आए थे हमारे लिए भी दूर भी जाना पड़ता है नौकरी के लिए हमें हर छोटी-छोटी चीज करते है । अपने गांव में तजा दूध खाने पीने के जीचे बड़ी आसानी से मील जाती है और जो हमें बाहर शहरों में खरीदनी पड़ती है वहां भी उस नौकरी की वजह से दूर जाते हैं । सबको पता है कि गांव का कितना शुद्ध वातावरण है या सब बीमारी से दूर है और ना तो शहरों में घर के कुछ ना कुछ बिमारी है गांव के शुद्ध वातावरण में कब सुबह से शाम हो जाए पता नहीं चलता । देख लो जो लोग अपन गांव छोड़ आए थे वे लोग आज अपने गांव आज वही दौड़े जा रहे हैं गांव की ओर नया घर बना रहे हैं शहरों में लोग डर रहे हैं और वो लोग अब सोच रहे है के अपने ही गांव में रहते है यही पर कुछ छोटा मोटा काम कर लेंगे । तो इस लिए हमें अपनी सोच बदलनी पड़ेगे ।

हमें स्वरोजगार के साधन जुटाने पड़ेगे हम लोगो को नौकरी के चक्कर में न रहके कुछ अपना बिज़नेस करने के बारे में सोचना चाहिए । क्या वो लोग कुछ खा कमा नही रहे है जो अभी भी गांव में रह रहे है और क्या उनके बचे स्कूल नही पढ़ रहे वो लोग खा कमा भी रहे है उनके बचे भी पढ़ रहे है । इसबारे में हमारी जो सरकार है उनको इस और ध्यान देना पड़ेगा । क्योकि पहाड़ से पलायन का जो मुख्य कारण है वो है अछि शिक्षा का न होना , अच्छे स्कूल न होना , बेसिक स्कूलो में शिक्षा का गिरता स्तर । अगर सरकार बेसिक शिक्षा पर ध्यान दे तो पलायन काफी हद तक रुक सकता है । आज के कंप्टीशन वाले टाइम में हर कोई सोचता है के बचो के अच्छी शिक्षा हो । किसी को भी अपने गांव घर से दूर ना जाना पड़े इसके लिए सहज वसुधा गांव गांव या उसके आसपास उपलब्ध हो तो कोई भी गांव से दूर नहीं होगा । अच्छे स्कूल कॉलेज अस्पताल  उपलब्ध हो तो नहीं होगा स्कूल तो फिर भी बने हैं लेकिन खेल सारा अंग्रेजी मीडियम का है अभी गांव में बने तो अप्लाई नहीं होगा और इसके आधार पर नौकरियां भी वहीं मिले तो बहुत ही बदलाव आएगा वह नहीं बदलेगा जो वहां है मेरी सोच है |

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